वतन के वीर सपूत

जिस धरा पे मैं पला हूँ ,

गीत वहीं का गाऊं।

विजय पताका तिरंगा प्यारा ,

विश्व में फहराऊं।

हूँ मैं लाल अपनी माँ का यही ,

सबको समझाऊं।

रण – भूमि में उतरूँ तो धरा ,

लाल मैं कर आऊँ।

आऊँ मैं अपने जिद पे तो इंच -इंच ,

का हिसाब लगा दूँ।

तुम तो बस अभी खैर मनाओ मैं ,

राजनैतिक बेड़ियों में बंधा ।

खुल जाने दो ये बेड़ियाँ फिर ,

तुमसे मिलता हूँ।

तास्कंद, शिमला तमाम समझौतों

का हिसाब करता हूँ।

                                                 चन्द्रकांत सिंह    

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