~~ डूबने को है~~

डूबने को है दिल मेरा इश्क के समंदर में ,

         फिर भी पतवार चलाता हूँ ।

            ध्यान से देखना मुझे ,

मैं वो नहीं जो इश्क का कारोबार चलाता हूँ ।

     दिल तो,  दिल सही ,  दिमाग भी

          न्योछावर किया है तुझपे ।

     क्यों ? क्योंकि मैं वो पूंजीपति नहीं ,

जो इश्क का बाज़ार सजाता हूँ ।

सजाता हूँ , सजाता हूँ – मैं

सपने अतीत के, भविष्य के और वर्तमान के 

पर मैं वो नहीं ,

जो सपने बेचने का दुकान सजाता हूँ ।

अगर कुछ सच है तो, सच है यह जीवन

जिसे मैं जीवंत बताता  हूँ ।

मैं वो नहीं जो जीवन को ,यथार्थ बताता हूँ 

मैं वो भी नहीं जो जीवन को निस्वार्थ बताता हूँ ।

हूँ तो बस एक तन और मन जो यह संसार बनाता हूँ ।

डूबने को है दिल मेरा इश्क के समंदर में 

फिर भी पतवार चलाता हूँ ।

                                               ~~ चन्द्रकांत कुमार सिंह ~~

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