~~ डूबने को है~~

अनकहा

डूबने को है दिल मेरा इश्क के समंदर में ,

         फिर भी पतवार चलाता हूँ ।

            ध्यान से देखना मुझे ,

मैं वो नहीं जो इश्क का कारोबार चलाता हूँ ।

     दिल तो,  दिल सही ,  दिमाग भी

          न्योछावर किया है तुझपे ।

     क्यों ? क्योंकि मैं वो पूंजीपति नहीं ,

जो इश्क का बाज़ार सजाता हूँ ।

सजाता हूँ , सजाता हूँ – मैं

सपने अतीत के, भविष्य के और वर्तमान के 

पर मैं वो नहीं ,

जो सपने बेचने का दुकान सजाता हूँ ।

अगर कुछ सच है तो, सच है यह जीवन

जिसे मैं जीवंत बताता  हूँ ।

मैं वो नहीं जो जीवन को ,यथार्थ बताता हूँ 

मैं वो भी नहीं जो जीवन को निस्वार्थ बताता हूँ ।

हूँ तो बस एक तन और मन जो यह संसार बनाता हूँ ।

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वतन के वीर सपूत

जिस धरा पे मैं पला हूँ ,

गीत वहीं का गाऊं।

विजय पताका तिरंगा प्यारा ,

विश्व में फहराऊं।

हूँ मैं लाल अपनी माँ का यही ,

सबको समझाऊं।

रण – भूमि में उतरूँ तो धरा ,

लाल मैं कर आऊँ।

आऊँ मैं अपने जिद पे तो इंच -इंच ,

का हिसाब लगा दूँ।

तुम तो बस अभी खैर मनाओ मैं ,

राजनैतिक बेड़ियों में बंधा ।

खुल जाने दो ये बेड़ियाँ फिर ,

तुमसे मिलता हूँ।

तास्कंद, शिमला तमाम समझौतों

का हिसाब करता हूँ।

                                                 चन्द्रकांत सिंह    

  ~~ डूबने को है~~

डूबने को है दिल मेरा इश्क के समंदर में ,

         फिर भी पतवार चलाता हूँ ।

            ध्यान से देखना मुझे ,

मैं वो नहीं जो इश्क का कारोबार चलाता हूँ ।

     दिल तो,  दिल सही ,  दिमाग भी

          न्योछावर किया है तुझपे ।

     क्यों ? क्योंकि मैं वो पूंजीपति नहीं ,

जो इश्क का बाज़ार सजाता हूँ ।

सजाता हूँ , सजाता हूँ – मैं

सपने अतीत के, भविष्य के और वर्तमान के 

पर मैं वो नहीं ,

जो सपने बेचने का दुकान सजाता हूँ ।

अगर कुछ सच है तो, सच है यह जीवन

जिसे मैं जीवंत बताता  हूँ ।

मैं वो नहीं जो जीवन को ,यथार्थ बताता हूँ 

मैं वो भी नहीं जो जीवन को निस्वार्थ बताता हूँ ।

हूँ तो बस एक तन और मन जो यह संसार बनाता हूँ ।

डूबने को है दिल मेरा इश्क के समंदर में 

फिर भी पतवार चलाता हूँ ।

                                               ~~ चन्द्रकांत कुमार सिंह ~~

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